Tuesday, October 27, 2020
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आरक्षण एक अभिशाप

आरक्षण हमारे देश के लिए गले की फांस बन चुका है, जिसे देखों आरक्षण की मांग कोलेकर सड़कों पर उतर आता है। लोग किस जाति धर्म और मजहब के नाम आरक्षण कीमांग करते है ? जबकि इस देश में सभी को जीने का सामान्य अधिकार है फिर क्यों हमखुद ही अपने आपको और अपनी समाज को नीचा दिखाकर औरों की अपेक्षा कम आंकेजाने की मांग करते है। सही मायने में सरकार आरक्षण की जंग की जिम्मेदार है। औरआरक्षण देश की बर्बादी और मौत का जिम्मेदार है। क्योंकि आरक्षण मांगने वाले याआरक्षित लोग कहीं ना कही सामान्य वर्ग से कमजोर होते है और ऐसे ही कमजोर लोगोंके हाथों में हम अपने देश की कमान थमा देते है। जो उसको थामने लायक थे ही नहीं।बस उन्हें तो यह मौका आरक्षण के आधार पर मिल गया।
आरक्षण से होने वाले नुकसान
जरा गौर करें आरक्षण से होने वाले नुकसानों पर तो शायद यह जंग थम जाए और मांगसहमति में बदल जाए। आज हमारे देश में कई इंजीनियर और डॉक्टर्स आरक्षित जातिसे है। जिनकी नियुक्ति को आरक्षण का आधार बनाया गया। एक सामान्य वर्ग, सामान्य जाति के छात्र और एक आरक्षित जाति के छात्र के बीच हमेषा ही सामान्यजाति के छात्र का शोषण हुआ, चाहे स्कूल में होने वाला दाखिला हो , फीस की बात होया अन्य प्रमाण पत्रों की। इन सभी आरक्षित जति वाले छात्र को सामान्य जाति वालेछात्र से आगे रखा जाता है। क्या सामान्य जाति वाले छात्र के पालक की आमदनीआरक्षित जाति वाले छात्र से अधिक होती है। शायद नहीं फिर भी उसे स्कूल फीस मेंकटौती मिलती है और साथ-ही साथ छात्रवृति भी दी जाती है। इतना ही नहीं परीक्षा मेंकम अंक आने पर भी सामान्य जाति वाले छात्र के अपेक्षा उसे प्राथमिकता पर लियाजाता है। जबकि सामान्य जाति वाला छात्र स्कूल की पूरी फीस भी अदा करता है औरमन लगाकर पढ़ने के बाद परीक्षा में अच्छे अंकों से पास भी होता है। फिर भी उसकेसाथ यह नाइंसाफी सिर्फ इसलिए होती है क्योंकि वह सवर्ण जाति से वास्ता रखता है। 
पात्रों को नौकरी क्यों नहीं
अगर हम इसी कहानी के दूसरे पड़ाव की बात करें यानी नौकरी की तो अच्छे अब्बलनंबरों से पास हानेे के बाबजूद सवर्ण जाति की बजाय उस व्यक्ति को वह नौकरी सिर्फइसलिए मिल जाती है क्योंकि वह आरक्षित जाति से है। जबकि वह उस नौकरी कीपात्रता नहीं रखता था, क्योंकि उसने तो यह पढ़ाई सरकार के पैसों की है, जबकि सवर्णजाति के छात्र ने यह तक पहुंचने में अपने मां-बाप के खून पसीने की कमाई को दांव परलगा दिया। पर मिला क्या, निराषा मां-बाप की आंखों के आंसू और सरकार की खोखलीमजबूरियों का हवाला। जिनसे सिर्फ दिल भर जाता है पेट की आग और जहन में एकसवाल हमेषा शोलों की तरह दहकता रहता है कि क्या सामान्य जाति वाले हार में पैदाहोना ही मेरे लिए अभिषाप बना गया? 
तो विकास की परिभाषा ही बदल जाए
वही अगर गौर देश के विकास पर किया जाए तो शायद विकास की परिभाषा ही बदलजाएगी। विकास तो हुआ पर देश का नहीं बल्कि देशद्रोहियों का जिनको हमारे वतन मेंरहने की जगह मिली, खाने को रोटी मिली, तन ढ़कने को कपड़े मिले। उन्होंने ही इससरजमी को गिरवी रख दिया, हमारे अपनों को एक-एक निवालों को तरसा दिया, हमारेघरों की इज्जत को वेपर्दा कर उन्हें बदनाम और देश को बर्बाद कर दिया, बिल्कुल यहीसब तब हुआ था जब हम अंग्रेजों के गुलाम थे और वह सब अब भी हो रहा है। जब हमअपनों के गुलाम है। ना हम तब आजाद थे और ना ही हम अब आजाद है। 
हमें अपनों ने ही लूटा
फर्क बस इतना है कि तब हमें गैरों ने लूटा था आज हमें कोई हमारा अपना ही लूट रहाहै। देश में विकास की कड़ी को जोड़ने के लिए कुछ ऐतिहासिक पहल तो की गई औरइतिहास भी बना मगर विकास का नहीं बल्कि भ्रष्टाचार की भंेट चढ़ रहे देश केविनाश का। मामला 2 जी स्पेक्ट्रम का हो कॉमनवेल्थ गेम्स का हो या फिर चाराघोटाला, आदर्श घोटाला का हो। सपने और स्कीम विकास के धरातल से ही शुरू की गईथी मगर विकास जस की तस धरातल पर ही रहा। 
देष में आर्थिक गरीबी नहीं
इसको बनाने वाले आसमान की बुलंदियों को छू गये। शायद सबके बाद एक बार आपकोअपने देश पर गर्व हो और दूसरी बार शर्म से आंखे झुक जाए यह सोचकर कि हमारा देशआर्थिक गरीब आज भी नहीं है। मगर शारीरिक और मानसिक अपंग जरूर हो चुका है।फिलहाल देश की इस दर्द भरी कहानी पर कुछ भी कहना जल्दबाजी होगा। मगर इससवाल का जबाब ना आपके पास है ना हमारे पास और ना ही देश के किसी राजनेता केपास। आइये हम सब मिलकर इस सवाल के जबाव को ढूंढने का प्रयास करें। हमारीकोषिश निरंतर जारी रहेगी। 
बस यहां से शुरू होती है देश की बर्बादी की दस्तान, जिसके बाद शायद आप किसी भीजाति या धर्म से हो। अगर इस देश से वास्ता रखते है तो आरक्षण की मांग नहीं करेंगे।बल्कि इसे हमेषा-हमेषा के लिए खत्म कर देने की गुजारिश करेंगे।
मजबूरी का नाम संविधान
जिस आरक्षित व्यक्ति को सरकार ने डॉक्टर बनाया सही मायने में वह इस काबिल नहींथा। मगर क्या करें मजबूरी का दूसरा नाम संविधान है। इन आरक्षित डॉक्टर साहब केहाथों में अब कई मौत और जिन्दगी कैद हो। लेकिन इन्हें अंदाजा नही ंहै कि इलाजपढ़ाई से होता है आरक्षण से नहीं। अस्पताल में इलाज के दौरान होने वाली कई मौतोंका जिम्मेदार आरक्षण को ही ठहराया जा सकता है। क्योंकि उन्होंने सरकार औरआरक्षण पर अपना विष्वास जताया था जबकि सरकार की उपेक्षा के षिकार हुए काबिलडॉक्टर निजी अस्पतालों में अपनी सेवाएं देकर लोगों की जान बचा लेते है कारण साफहै उन डॉक्टरों ने मन लगाकर पढ़ाई की थी और मरीज की बीमारी पर काबू कर पानीकी जानकारी हासिल की थी। उन्हें यह डिग्री किसी आरक्षण के आधार के आधार परनहीं बल्कि पात्रता के आधार पर दी गयी थी। लेकिन यह देष का दुर्भाग्य ही है कि उसकेपास पारस की नजर ही नहीं है। जो ऐसे हीरों को चुन सके।
तो कई जिंदगियां बच जाती
 खैर यह तो हुई आम जिंदगियों की बात, अब अगर बात की जाए आम और खास सेजुड़कर बने इस विषाल भारत के भविष्य की। तो वह भी पूरी तरह से अंधकार में है।क्योंकि डॉक्टरों की ही तरह इंजीनियर्स को भी आरक्षण के आधार पर आसानी से मौकामिल जाता है। जबकि उन्हें तो यह से पास कर देते है उनमें कितनी जिंदगियां अपनाबसेरा बनाकर सपना देख रही होगी अपने सुनहरे भविष्य का वही कई ऐसी सड़कों काजाल को वह एक इषारे में पास कर देते है जिन पर दौड़ते कई लोग मंजिल की आस मेंदौड़े जा रहे है। जिन्हें शायद ही मंजिल मिल सके क्योंकि जिन रास्तों के सहारे वहमंजिल पाना चाहते है वह आरक्षित सोच से बनाई गई है।

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